कुछ फिल्में ऐसी होती है जिन्हें देखने से आपको उबन महसूस नही होती । ऐसी ही एक फ़िल्म 1982 में आई नदिया के पार। इस फ़िल्म की कहानी को दर्शकों ने खूब सराहा । सिर्फ फ़िल्म ही नही बल्कि फ़िल्म के गाने भी लोकप्रिय हुए और आज भी उनकी लोकप्रियता वैसे ही बरकरार है। इस फ़िल्म की शूटिंग जहां हुई वहां के लोग आज भी उस समय को यादकर खुशी से झूम उठते है। आज हम आपको उस गांव में लेकर चलेंगे और वहां के लोगों से मिलाएंगे और उनसे ही जानने का प्रयास करेंगे कि कैसा माहौल था जब सचिन और साधना की जोड़ी इस गांव में शूटिंग करने पहुँची थी।
जौनपुर जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर केराकत तहसील के मुफ्तीगंज विकास खंड अंतर्गत स्थित है विजयीपुर गांव । ये गांव सई और गोमती के संगम स्थल पर स्थित है। गांव के रहने वाले रामजनक सिंह ने लोकेशन के लिए अपने गांव को चुना। राजश्री प्रोडक्शन की यूनिट गांव में पहुँची। विजयीपुर गांव में ही चंदन और गुंजा का घर था लेकिन गुंजा के घर को चौबेपुर गांव में दर्शाया गया। फ़िल्म के हीरो सचिन यानी चंदन का जो घर कच्चा था वो अब पक्का मकान बन गया है। वही हीरोइन साधना यानी गुंजा का घर की हालत आज भी पहले की ही तरह है। सिर्फ कुछ हिस्सा पक्का हुआ है।
गांव में आज भी वो कुआँ वैसे ही है जिसमें बाल्टी गिरने पर हीरो चंदन उसे निकालता है। गांव के लोग बताते है कि इसी जगह खाली मैदान में पंचायत की शूटिंग हुई थी और इसी जगह पर होली का गीत " जोगी जी वाह जोगी जी" की शूटिंग हुई थी। गांव के लोग बताते है कि जब भी कोई नदिया के पार फ़िल्म का नाम लेता है तो वो लोग बड़े गर्व से बताते है कि ये हमारे गांव में बनी है।
गांव के रहने वाले योगेंद्र सिंह बताते है कि जब फ़िल्म की शूटिंग हुई उस समय उनकी उम्र 20 साल थी। शूटिंग के दौरान वो हीरोइन गुंजा से हँसी मजाक करते थे तो गुंजा भी हँसते हुए ही वैसे ही मजाक किया करती थी। आज भी योगेंद्र फ़िल्म के शूटिंग के दिनों को याद करके खुश हो जाते है।
गांव में गोमती के किनारे जहां चंदन नाव से नदी पार करते है वहां आज भी लोग नाव के सहारे ही नदी पार करते नजर आते है। नाव का इंतजार कर रहे अजीत सिंह बताते है कि उन दिनों में लोगों में एक अलग उत्साह था। फ़िल्म के गीत से लेकर कहानी तक सुपर हिट रही ।
पुरुषों को छोड़िए महिलाएं भी आज भी नदिया के पार फ़िल्म की शूटिंग को याद करती है । गांव की बुजुर्ग महिला विद्या देवी बताती है कि इतनी भीड़ होती थी लोग एक दूसरे के ऊपर गिर जाते थे। महिलाएं बताती है कि फ़िल्म में शादी का गीत "जब तक पूरे ना हो फेरे सात" की शूटिंग में वो लोग भी शामिल थी। किसी का भतीजा गोली खेलता हुआ नजर आता है तो कोई गुंजा के साथ पानी भरते और नदी किनारे कपड़े धोते नजर आती है।
नदी के उस पार आज भी वो बरगद का पेड़ उसी तरह खड़ा है जैसे पहले था। फ़िल्म में इसी बरगद के पास हीरो चंदन आते है । यहां के रहने वाले निषाद समाज के लोग बताते है कि इसी जगह शूटिंग हुई लेकिन ऐसी फिल्म आज तक कोई दूसरी नही बनी जबकि कई फिल्मों में यहां शूट किया गया। लोग बताते है कि जब तक 4 से 5महीने फ़िल्म की शूटिंग हुई तब कोई स्कूल या कालेज नही खुला । सब बच्चे शूटिंग देखने आते थे।
फ़िल्म नदिया के पार का गांव आज भी उसी तरह है। गुंजा का घर उसी तरह है बस कुछ हिस्सा बदल गया । गांव में लालटेन की बजाय बिजली के बल्ब जलने लगे है लेकिन गांव की गलियां वैसी ही है, आज भी लोग नाव के सहारे नदी पार करते है। आज भी यहां के लोग गुंजा और चंदन की बाते ऐसे करते है जैसे वो लोग इसी गांव के रहने वाले है । अगर आपने नदिया के पार फ़िल्म देखी है तो यहां आकर आपको ऐसा जरूर लगेगा कि किसी गली से चंदन और गुंजा न निकल आये यहां की सड़कों पर चलते ही न चाहते हुए भी आपके मुंह से "कउने दिशा में लेके चला रे बटोहिया" गीत निकलने लगते है।
0 Comments